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योग सार्थक है तभी, जब द्वैत एकाकार हो,

योग सार्थक है तभी,

जब द्वैत एकाकार हो,

मैं रहूँ या ना रहूँ,
तुमको मुझसे प्यार हो,,

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हिन्दी कविता, द्वारा विवेक राजपूत, हिन्दी कवि

A Collection Hindi Poems, Hindi Geet, Hindi Poetry, Shayari & Ghazals

by – Vivek Rajpoot, Hindi Poet

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उसकी तस्वीर जो चन्द बरसों पुरानी देखी, हीर रांझे की मैने उसमें दीवानी देखी,,

उसकी तस्वीर जो चन्द बरसों पुरानी देखी,
हीर रांझे की मैने उसमें दीवानी देखी,,
कल जो मद्मस्त थी सावन की घटा के जैसी,
आज देखी तो लगा बदली सयानी देखी,,

विवेक राजपूत, हिन्दी कवि

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खामोशी को समझे, मेरी तन्हाई को जाने।

खामोशी को समझे, मेरी तन्हाई को जाने।
क्या कहना चाहता हूँ? नजरों से पहचानें।।
ये सोच अंधेरे में, अक्सर बैठा करता हूँ मै।
जाने वो कब आ जाए, कमरे में शमां जलाने।।

 

विवेक राजपूत, हिन्दी कवि

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कहीं टूट ना जाएं रिश्ते? मैं ये डर छोड आया हूँ,

कहीं टूट ना जाएं रिश्ते? मैं ये डर छोड आया हूँ,
बहुत दिनों से था कैद जिसमें, वो घर छोड आया हूँ,,
मुझे ना रोक सकोगे तुम, कि मेरा हौंसला उडानें है,
ऐ हवाऔ पार करो, कि मैं अपने पर तोड आया हूँ,,

विवेक राजपूत, हिन्दी कवि

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तुम आ रहे हो तो आओ, मै इन्तजार करता हूँ,,

तुम आ रहे हो तो आओ, मै इन्तजार करता हूँ,,

हर एक दरिया को बहुत सलीके से पार करता हूँ,,

(शेर)

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सारे वादे और सारी कसमे कब निभाते है,

सारे वादे और सारी कसमे कब निभाते है,
जो निभाते है, वो भी दिल से कब निभाते है,,

मेरे अफसानों का अन्जामों-आगाज है यें,
आते-आते वो तेरे नाम पे आ जाते है,,

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दब जाता है कभी प्यार भी आवाज़ की तरह,

दब जाता है कभी प्यार भी आवाज़ की तरह,
टूट जाते है कई ख्वाब भी साज़ की तरह,,
शाहजहाँ भी अब यहाँ पैदा नही होते,
सबकी किस्मत नही होती मुमताज़ की तरह,,
(विवेक राजपूत)

Dab Jata Hai Kabhi Pyar Bhi Aawaj Ki Tarah,
Toot Jate Hai Kai Khwab Bhi Saaz Ki Tarah,
Shahjah Bhi Ab Yahan Paida Nahi Hote,
Sabki Kismat Nahi Hoti Mumtaz Ki Tarah,,
(Vivek Rajpoot)

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