Archive | April 2012

इस जीवन की व्यथा है ये

मेरी एक हिन्दी कविता से कुछ पंक्तियां (Few lines from my one Hindi Poem)

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इस जीवन की व्यथा है ये,
कि प्यार अभी तक ना पाया,,
रचियता भी इस रचना को,
अलंकार कोई ना दे पाया,,
(विवेक राजपूत)
—–
Iss Jeevan Ki Vyatha Hai Ye,
Ki Pyar Abhi Tak Na Paya,,
Rachiyata Bhi Iss Rachna Ko,
Alankar Koi Na De Paya,,
(Vivek Rajpoot)

Hindi Poet, Hindi Kavi, हिन्दी कवि

फिर एक कहानी सुना दी उसने,

फिर एक कहानी सुना दी उसने,
अपनी औकात दिखा दी उसने,,
विवेक राजपूत

FIR EK KAHANI SUNA DI USANE,
APANI AUKAT DIKHA DI USANE,,
VIVEK RAJPOOT

Hindi Poet, हिन्दी कवि

A Collection Hindi Poems, Hindi Geet, Hindi Poetry, Shayari & Ghazals

 Vivek Rajpoot, Hindi Poet

 हिन्दी कविताएँ, हिन्दी काव्य, हिन्दी गीत, शायरी व गज़लों का संग्रह

 द्वारा – विवेक राजपूत, हिन्दी कवि

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( विवेक राजपूत द्वारा माध्यम ग्रुप की स्थापना की गयी जिसमें नये और  पुरानें कवियों व शायरों को सम्मिलित करने का एक सफल प्रयास किया जिससे कवि सम्मेलन व मुशायरों में उनकी प्रस्तुति करायी जा सके,  A group of new and old poets and Shayar created by Vivek Rajpoot successful effort called MADHYAM to give them a chance to perform in Kavi Sammelan and Mushaira )

ये ना कहना कि मेरी याद नही आती है

ये ना कहना कि मेरी याद नही आती है,

सोचने ही से मेरी जान निकल जाती है,,
(विवेक राजपूत)
Ye Na Kahana Ki Meri Yaad Nahi Aati Hai,
Sochne Hi Se Meri Jaan Nikal Jati Hai,,
(Vivek Rajpoot)

Hindi Poet

                              A Collection Hindi Poems, Hindi Geet, Poetry, Shayari & Ghazals

by – Vivek Rajpoot, Hindi Poet
 हिन्दी कविताएँ , हिन्दी  गीत, शायरी व गज़लों का संग्रह
 द्वारा – विवेक राजपूत, हिन्दी कवि
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( विवेक राजपूत द्वारा माध्यम ग्रुप की स्थापना की गयी जिसमें नये और  पुरानें कवियों व शायरों को सम्मिलित करने का एक सफल प्रयास किया जिससे कवि सम्मेलन व मुशायरों में उनकी प्रस्तुति करायी जा सके,  A group of new and old poets and Shayar created by Vivek Rajpoot successful effort called MADHYAM to give them a chance to perform in Kavi Sammelan and Mushaira )

जो ऑखों से उतर के

Vivek Rajpoot, Hindi Poat, विवेक राजपूत, हिन्दी कवि

हिन्दी कविता (Hindi Kavita)

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जो ऑखों से उतर के,
दिल मे आए, मीत बन जाए,,
जिगर की टीस जब,
होठों पे आए, गीत बन जाए,,
मुझे ना रोक पाओगे,
कभी तुम गीत लिखने से,,
तुम्हारी याद मे जो,
भी लिखूं वो, गीत बन जाए,,

—————————–

JO AANKHO SE UTAR KE,

DIL ME AAYE, MEET BAN JAYE,,

JIGAR KI TEES JAB,

HOTHO PE AAYE, GEET BAN JAYE,,

MUJHE NA ROK PAOGE,

KABHI TUM GEET LIKHNE SE,

TUMHARI YAAD ME JO,

BHI LIKHO WO GEET BAN JAYE,,

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A Collection Hindi Poems, Hindi Geet, Hindi Poetry, Shayari & Ghazals

by – Vivek Rajpoot, Hindi Poet

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रस (काव्य शास्त्र)

रस (काव्य शास्त्र)
श्रव्य काव्य के पठन अथवा श्रवण एवं दृश्य काव्य के दर्शन तथा श्रवण में जो अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है, वही काव्य में रस कहलाता है। रस से जिस भाव की अनुभूति होती है वह रस का स्थायी भाव होता है। रस, छंद और अलंकार काव्य रचना के आवश्यक अवयव होते हैं।
काव्य में जो आनन्द आता है वह ही काव्य का रस है। काव्य में आने वाला आनन्द अर्थात् रस लौकिक न होकर अलौकिक होता है। रस काव्य की आत्मा है। संस्कृत में कहा गया है कि “रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम्” अर्थात् रसयुक्त वाक्य ही काव्य है।
रस अन्त:करण की वह शक्ति है, जिसके कारण इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं, मन कल्पना करता है, स्वप्न की स्मृति रहती है। रस आनंद रूप है और यही आनंद विशाल का, विराट का अनुभव भी है। यही आनंद अन्य सभी अनुभवों का अतिक्रमण भी है। आदमी इन्द्रियों पर संयम करता है, तो विषयों से अपने आप हट जाता है। परंतु उन विषयों के प्रति लगाव नहीं छूटता। रस का प्रयोग सार तत्त्व के अर्थ में चरक, सुश्रुत में मिलता है। दूसरे अर्थ में, अवयव तत्त्व के रूप में मिलता है। सब कुछ नष्ट हो जाय, व्यर्थ हो जाय पर जो भाव रूप तथा वस्तु रूप में बचा रहे, वही रस है। रस के रूप में जिसकी निष्पत्ति होती है, वह भाव ही है। जब रस बन जाता है, तो भाव नहीं रहता। केवल रस रहता है। उसकी भावता अपना रूपांतर कर लेती है। रस अपूर्व की उत्पत्ति है।
रस के प्रकार
रस 9 प्रकार के होते हैं –

1. श्रृंगार रस
2. हास्य रस
3. करुण रस
4. रौद्र रस
5. वीर रस
6. भयानक रस
7. वीभत्स रस
8. अद्भुत रस
9. शांत रस
वात्सल्य रस को दसवाँ एवम् भक्ति को ग्यारहवाँ रस भी माना गया है। वत्सल तथा भक्ति इनके स्थायी भाव हैं।

(Information for public from diffident internet websites 

Vivek Rajpoot (Hindi Poet)

द्वारा – विवेक राजपूत, हिन्दी कवि

छंद

छंद
छंद वस्तुत: एक ध्वनि समष्टि है । छोटी-छोटी अथवा छोटी बडी ध्वनियां जब एक व्यवस्था के साथ सामंजस्य प्राप्त करती हैं तब उसे एक शास्त्रीय नाम छंद दे दिया जाता है । जब मात्रा अथवा वर्णॊं की संख्या , विराम , गति , लय तथा तुक आदि के नियमों से युक्त कोई रचना होती है इस छंद अथवा पद्य कहते हैं , इसी को वृत्त भी कहा जाता है ।
छन्दस् शब्द ‘छद’ धातु से बना है । अत: छंद शब्द के मूल में गति का भाव है ।
छंद को पद्य रचना का मापदंड कहा जा सकता है। बिना कठिन साधना के कविता में छंद योजना को साकार नहीं किया जा सकता ।
संस्कृत में कई प्रकार के छन्द मिलते हैं जो वैदिक काल के जितने प्राचीन हैं। वेद के सूक्त भी छन्दबद्ध हैं।
वाक्य में प्रयुक्त अक्षरों की संख्या एवं क्रम, मात्रा-गणना तथा यति-गति से सम्बद्ध विशिष्ट नियमों से नियोजित पद्यरचना ‘छन्द’ कहलाती है। छन्द की सबसे पहले चर्चा ऋग्वेद में हुई है। यदि गद्य की कसौटी ‘व्याकरण’ है तो कविता की कसौटी ‘छन्दशास्त्र’ है। पद्यरचना का समुचित ज्ञान छन्दशास्त्र की जानकारी के बिना नहीं होता। काव्य ओर छन्द के प्रारम्भ में ‘अगण’ अर्थात ‘अशुभ गण’ नहीं आना चाहिए।

छंद के अंग

छंद के निम्नलिखित अंग होते हैं –

गति – पद्य के पाठ में जो बहाव होता है उसे गति कहते हैं।
यति – पद्य पाठ करते समय गति को तोड़कर जो विश्राम दिया जाता है उसे यति कहते हैं।
तुक – समान उच्चारण वाले शब्दों के प्रयोग को तुक कहा जाता है। पद्य प्रायः तुकान्त होते हैं।
मात्रा – वर्ण के उच्चारण में जो समय लगता है उसे मात्रा कहते हैं। मात्रा २ प्रकार की होती है लघु और गुरु । ह्रस्व उच्चारण वाले वर्णों की मात्रा लघु होती है तथा दीर्घ उच्चारण वाले वर्णों की मात्रा गुरु होती है। लघु मात्रा का मान १ होता है और उसे । चिह्न से प्रदर्शित किया जाता है। इसी प्रकार गुरु मात्रा का मान मान २ होता है और उसे ऽ चिह्न से प्रदर्शित किया जाता है।
गण – मात्राओं और वर्णों की संख्या और क्रम की सुविधा के लिये तीन वर्णों के समूह को एक गण मान लिया जाता है। गणों की संख्या ८ है – यगण (।ऽऽ), मगण (ऽऽऽ), तगण(ऽऽ।), रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।), नगण (।।।) और सगण (।।ऽ)।
गणों को आसानी से याद करने के लिए एक सूत्र बना लिया गया है- यमाताराजभानसलगा । सूत्र के पहले आठ वर्णों में आठ गणों के नाम हैं। अन्तिम दो वर्ण ‘ल’ और ‘ग’ छन्दशास्त्र के दग्धाक्षर हैं। जिस गण की मात्राओं का स्वरूप जानना हो उसके आगे के दो अक्षरों को इस सूत्र से ले लें जैसे ‘मगण’ का स्वरूप जानने के लिए ‘मा’ तथा उसके आगे के दो अक्षर- ‘ता रा’ = मातारा (ऽऽऽ)

छंद के प्रकार

  • मात्रिक छंद ː जिन छंदों में मात्राओं की संख्या निश्चित होती है उन्हें मात्रिक छंद कहा जाता है। जैसे – दोहा, रोला, सोरठा, चौपाई
  • वार्णिक छंद ː वर्णों की गणना पर आधारित छंद वार्णिक छंद कहलाते हैं। जैसे – घनाक्षरी, दण्डक
  • वर्णवृत ː सम छंद को वृत कहते हैं। इसमें चारों चरण समान होते हैं और प्रत्येक चरण में आने वाले लघु गुरु मात्राओं का क्रम निश्चित रहता है। जैसे – द्रुतविलंबित, मालिनी
  • मुक्त छंदː भक्तिकाल तक मुक्त छंद का अस्तित्व नहीं था, यह आधुनिक युग की देन है। इसके प्रणेता सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ माने जाते हैं। मुक्त छंद नियमबद्ध नहीं होते, केवल स्वछंद गति और भावपूर्ण यति ही मुक्त छंद की विशेषता हैं।

छंदों के कुछ प्रकार

दोहा

दोहा मात्रिक छंद है। दोहे के चार चरण होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम तथा तृतीय) चरण में 13-13 मात्राएँ और सम चरणों (द्वितीय तथा चतुर्थ) चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु मात्रा का होना आवश्यक होता है।

रोला

रोला मात्रिक सम छंद होता है। इसके विषम चरणों में 11-11 मात्राएँ और सम चरणों में 13-13 मात्राएँ होती हैं।

सोरठा

सोरठा मात्रिक छंद है और यह दोहा का ठीक उलटा होता है। इसके विषम चरणों चरण में 11-11 मात्राएँ और सम चरणों (द्वितीय तथा चतुर्थ) चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं। विषम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु मात्रा का होना आवश्यक होता है।

चौपाई

चौपाई मात्रिक सम छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं।

कुण्डलिया

कुण्डलिया मात्रिक छंद है। दो दोहों के बीच एक रोला मिला कर कुण्डलिया बनती है। पहले दोहे का अंतिम चरण ही रोले का प्रथम चरण होता है तथा जिस शब्द से कुण्डलिया का आरम्भ होता है, उसी शब्द से कुण्डलिया समाप्त भी होता है।

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(आपकी जानकारी के लिए – उक्त विवरण इन्टरनेट की विभिन्न साईटस् से लिया गया है)

Collected by – Vivek Rajpoot, Hindi Poet ( संकलन विवेक राजपूत, हिन्दी कवि )

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