Archive | February 2012

“डा॰ राजेन्द्र प्रसाद” की पुण्यतिथि पर उनको शत् शत् नमन्।

“डा॰ राजेन्द्र प्रसाद” की पुण्यतिथि पर उनको शत् शत् नमन्।

भारत के प्रथम राष्ट्रपति,
भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेता,
“भारत रत्न ” की सर्वश्रेष्ठ उपाधि से सम्मानित,
जिसने अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर आधी शताब्दी तक अपनी मातृभूमि की सेवा की थी।
हमको इन पर गर्व है और ये सदा राष्ट्र की शान रहेगें।

By Vivek Rajpoot, Hindi Poet  ( विवेक राजपूत, हिन्दी कवि )

Vivek Rajput

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आज “पन्डित चन्द्र शेखर आजाद” की पूण्य तिथि पर राष्ट्र उन्हे नमन् करता है।

ए मेरे वतन के लोगों
जरा आंख मे भरलो पानी
जो शहीद हुए है उनकी
जरा याद करो कुर्बानी

२३ जुलाई, १९०६ को जन्मे “पन्डित चन्द्र शेखर” –
नाम
“आजाद’
बाप का नाम-
“स्वाधीनता’
घर-
“जेलखाना’
भारत माता के ये पुत्र आजादी के लिए लडते हुए मात्र 25 साल की उम्र में इलाहाबाद के कम्पनी बाग में 27 फरवरी 1931 को शहीद हो गये।

दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे।
आजाद हैं हम और आजाद ही रहेंगे।।

आज पूण्य तिथि पर –
राष्ट्र आपको नमन् करता है।

by – Vivek Rajpoot , Hindi Kavi ( विवेक राजपूत , हिन्दी कवि )

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आस पर हर पल तुम्हारे आगमन की दीप नयनों के द्वारे रख दिये है – Hindi Kavita by Vivek Rajpoot

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प्रेम में व्यक्ति जब किसी की प्रतिक्षा कर रहा होता है तो काव्य की कल्पना ये होती है

Prem me vyakti jab kisi ki pratiksha kar raha hota hai to kavya ki kalpna aisi hoti hai (Love poetry)

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आस पर हर पल तुम्हारे आगमन की,

दीप नयनों के द्वारे रख दियें है,

तुमको छू लेंगे तो सारे खिल उठेंगे,

फूल सूखे एक किनारे रख दियें है,,

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Aas par har pal tumhare agman ki,

deep nayno ke dware rakh diye hai,,

Tumko chu lenge to saare khil uthenge,

Phool sukhe ek kinare rakh diye hai,,

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by – Vivek Rajpoot, Hindi Poet

 हिन्दी कविता, हिन्दी गीत व गज़लों, शायरी का संग्रह

 द्वारा – विवेक राजपूत, हिन्दी कवि

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क्षितिज नही ये कोमल मन है ॰॰॰॰॰॰

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प्रेम की एक दशा ऐसी भी होती है जब प्रेमी को उसका अपना प्रतिबिम्ब भी स्वयं के भीतर नही दिखाई देता

There is a condition of lover some time when he is unable to see his own image inside his heart,  sad in love

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स्वयं की छवि नही है मुझमें,

कौन ये आकर छिपा है मुझमें,

दोष दृष्टि का नही तुम्हरी,

दर्द किसी का छिपा है मुझमें,,

क्षितिज नही ये कोमल मन है,

धरा नही ये सीमित तन है,,

मेरे ही घर में जो ना बरसे,

ऐसा सावन छिपा है मुझमें,,

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Swayam ki chavi nahi hai mujhme, Koun ye aakar chipa hai mujhme,,

dosh drishti ka nahi tumhari, dard kisi ka chipa hai mujhme,,

Shitij nahi ye komal man hai, Dhara nahi ye simit tan hai,

Mere hi ghar me jo na barse, Aisa sawan chipa hai mujhme,,

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by – Vivek Rajpoot, Hindi Poet

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(Made a group of hindi poets, Urdu Poets to give them chance of performance in kavi sammelan and mushaira )

हिन्दी कवियों, उर्दू शायरों का एक समुह बनाया है जिससे उन्हे मुशायरा न कवि सम्मेलन में अवसर प्राप्त हो सके।

महान कवि सुर्य कान्त त्रिपाठी “निराला” के जन्म दिवस पर उन्हे शत् शत् नमन्

प्रिय मित्रों,

आज हम अपने व्यस्त समय से थोडा समय निकाल कर याद करें एक ऐसे महान कवि को जिनका नाम ही “निराला” है।

आज इस हिन्दी कविता के सुमन महान कवि सुर्य कान्त त्रिपाठी “निराला” के जन्म दिवस पर उन्हे शत् शत् नमन्।

गीत गाने दो मुझे तो,

वेदना को रोकने को,,

भर गया है ज़हर से

संसार जैसे हार खाकर,

देखते हैं लोग लोगों को,

सही परिचय न पाकर,

बुझ गई है लौ पृथा की,

जल उठो फिर सींचने को,,

(सुर्य कान्त त्रिपाठी “निराला”)

Suryakant Tripathi “Nirala”

by – Vivek Rajpoot, Hindi Poet, Hindi Kavi ( विवेक राजपूत, हिन्दी कवि)

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निर्झर से नयनों से झर-२ कर – Hindi Poem by Vivek Rajpoot

हिन्दी कविता, हिन्दी काव्य

निर्झर से नयनों से झर-२ कर,

अश्रु,  जल धारा  हो  जाते  है,,

वेदना के सिन्धु का मंथन कर,

विष का घट, गट-२ पी जाते है,

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Nirjhar se nayno se jhar jhar kar,

Ashru jal dhara ho jate hai,

Vedna ke sindhu ka manthan kar,

vish ka ghat gat gat pee jaate hai,,

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(Jab jab sagar manthan kiya jaata hai, taab tab vish aur amrit nikalta hai, prem ek sagar ke saman hai, aur jab premi apani tadap se nikale aansoon ke sagar ka manthan karta hai to prem usse wo iswariye shakti pradan karta hai ki wo shiv ki tarah vish paan kar jata hai aur amrit doosron ke liye chod deta hai)

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चीं चीं चूँ चूँ के कलरव में हर्षित नही तुम क्यूँ बाले? By Vivek Rajpoot

हिन्दी कविता, हिन्दी कवि

चीं चीं चूँ चूँ के कलरव में,

हर्षित नही तुम क्यूँ बाले,,

रक्त रंजित कपौलो पे क्यूँ,

बिखरें  है  केश  यें  काले,,

 (प्रेम की विवशता में जब व्यक्ति होता है अपनो से दूर तब काव्य कल्पना यही कहती है- काव्य मधुलिका से from Kavya Mdhulika)

Sad in love alone . . . . .

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by – Vivek Rajpoot, Hindi Poet

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